गौ, गंगा, ऋषि और कृषि


Anshuman Dwivedi
The Listener
Career Consultant and Motivator

गंगा अब वार्षिक धारा नहीं रही। गांवों  के ज्यादातर कुएँ सूख गए है। तालाब या तो खेत में बदल गए है या उनपर मकान बन गए है। गंगा की सहायक नदियों का हाल गंगा से भी बुरा है। गंगा का उद्गम हिमालय स्थित गोमुख है। सुखद किन्तु आश्चर्य है कि  मध्य प्रदेश की नदियां उत्तर प्रदेश में  बहने वाली नदियों की तुलना में अधिक अविरल और निर्मल है। जबकि  मध्य प्रदेश की किसी  नदी का स्रोत हिमनद नहीं  है। वहां की नदियों का अधिकांश जल स्रोत वन एवं जंगल है।

गंगा के सतत प्रवाह का टूटना, बचे हुए जल का सड़ना, कुओं तालाबों का सूखना सबका कारण हमारी अप्राकृतिक जीवन शैली है। गांवों का विकास एवं समृद्धि एक राजनैतिक नारेबाजी है। थोक वोट बैंक की राजनीति  का ढोंग। ऋषि, कृषि, गौ, गंगा भारतीय संस्कृति के समवेत  और अखंडित स्वर है। ये चरों या तो एक ही साथ सधेंगे या एक ही साथ बिखरेंगे। इनमें से किसी एक को बाकी तीनो की उपेक्षा कर नहीं बचाया जा सकता।बिना ऋषि कृषि को अपनाये गौ  रक्षा और गंगा सफाई अभियान का नारा झूठ  और बेमानी के  सिवा कुछ नही है। 

भारत की पुराण कथाओं में धरती पर जब भी पाप बढ़ता है धरती  गाय का रूप धारण कर अपनी रक्षा की अभ्यर्थना देवताओं के समक्ष करती है। अर्थात , गाय धरती का समग्र है। गाय है तो धरती है। गंगा इसी गौ-संस्कृति  की कल-कल निनादित गत्यात्मक अभिवक्ति है। गाय गरीबों का धन, माँ की ममता, किसानों का साहस , श्रमिकों का फल और बालकों का वात्सल्य है। देवता भी गाय से जन्में है। वक़्त को नाम गाय ने दिया है। और भरतजनों की नातेदारी का आधार (गोत्र) तो गाय है ही। 

अंग्रेज़ों के आने के बाद भारत में कृषि ऋषि कर्म  न हो कर बाजार और व्यापार की वस्तु हो गयी। क्रमशः, कृषि उत्पादन को बढ़ाने के अनेक उपायों और उपकरणों का आविष्कार हुआ । परिणामस्वरूप, गो-वंश कृषि और कृषक के लिए कालवाह्य हो गए । गाय के बछड़े,उसका गोबर और न दूध देने वाली गाय अब हमारे लिए भार हो गए है।

 गायों के बचाने का एक ही मार्ग हो सकता है वह है गायों के अनुकूल अपनी जीवन शैली को ढालना न कि  इसके उलट। जब तक हम गायों के जीवन को अपने जीवन से अधिक महत्वपूर्ण नहीं मानेंगे तबतक शुभ घटित नहीं होगा। न हम बचेंगे न गाय। गाय तो फिर भी बच सकती है हमारा मिटना तय है। यही बात गंगा के लिए भी लागू है। और कुओं तालाबों के  लिए भी। हमने यदि अपनी जीवन शैली नहीं बदली तो मनरेगा के तहत कागज़ी और झूठे कुएँ तो खोदे जा सकते है ग्राम संस्कृति को पालने वाले सच्चे सरोवर नहीं। कुओं तालाबों का सूखना मात्र पानी का सूखना नहीं है एक पूरी-की-पूरी संस्कृति का मरना है। समग्र मानव जाति  के विनाश की पदचाप। नदियों को भूगोल और इतिहास के जानकार मानव की जीवन रेखा कहते है। किन्तु भारतीय संस्कृति में कुएँ , तालाब और नदियां स्वयं में प्राणवान सत्ता है न कि  रेखा। कथा है कि भगीरथ ने पूर्वजों को तारने के लिए गंगा को धरती पर लाने का अथक श्रम किया था। अर्थात  गंगा के बिना मनुष्य भटकती हुई आत्मा है। हम  आने वाले कल के पूर्वज है। गंगा मनुष्य मात्र की शाश्वत जरूरत है। मनुष्य होने के लिए भी और मनुष्य बनने के लिए भी। 

गंगा को निर्मल रखने के लिए उसका अविरल होना अनिवार्य शर्त है। आवश्यक है कि गंगा के रास्ते में खड़े हुए वृतों  (बांधों) को तोड़ा  जाए या उन्हें बौना किया जाये।  गंगा के दोनों तरफ महुआ , आम , जामुन , पीपल , बरगढ़ , पाकड़  के सघन वन और जंगल उगाये जाये। दोनों तरफ कम से कम १० किलोमीटर तक के क्षेत्र को आरक्षित घोषित किया जाये और किसी भी प्रकार के कृतिम निर्माण को अनिवार्यतः  रोका जाए। गंगा सहित जो भी गंगा की सहायक नदियाँ जिस किसी भी शहर से गुज़रती है  उन शहरों के नालों को नदियों में सीधे न गिराया जाए। नगर से कम से कम २० किलोमीटर की दूरी पर नालों को नहर की शक्ल में बदल कर फिर नदियों से जोड़ा जाए। सारे मिल ,कारखाने और फैक्ट्री जिनके निसृत प्रवाह में खतरनाक रासायनिक है उन्हें अनिवार्यतः  बंद किया जाए। 

इन प्रयासों के  कारण हमारी तथाकथित आधुनिक जीवन शैली प्रभावित हो सकती है। उसे प्रभावित होना भी चाहिए। कोई भी जीवन शैली स्वयं जीवन से बड़ी नहीं हो सकती। 

भारत के महान राजनेता और विचारक अटल जी ने कहा था कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। वह बड़े नेता है उन्होंने विश्व दृष्टि पायी है।  हम इतना जानते है कि  उत्तर भारत का पहला सिविल वॉर पानी के लिए होगा-- यदि हम इसी जीवन शैली को अपनाते हुए जीने की मूर्खता करते रहे तो।


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Comments

  1. भाई साहब सादर प्रणाम्
    आदरणीय अजय भईया ने आज आपका यह लेख मुझे भेजा... पढ़कर आनंदित हुआ...मेरे ज्ञान मे वृद्धि हुई
    अच्छा लगा.....अनंत शुभकामनाएं

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